Posts

Showing posts with the label Shamim Raza Faizi
ADVERTISEMENT

जब कभी नात हम गुनगुनाने लगे / Jab Kabhi Naat Hum Gungunane Lage

जब कभी ना'त हम गुनगुनाने लगे बस हमें मुस्तफ़ा याद आने लगे जब नबी के नवासे चले कर्बला चाँद सूरज भी आँसू बहाने लगे पाँव रक्खे हैं सरकार ने जिस जगह मेरी मिट्टी वहीं पर ठिकाने लगे मेरे आक़ा ज़रूर उन के घर आएँगे जो दुरूदों से घर को सजाने लगे रात काली थी लेकिन चमकने लगी मेरे सरकार जब मुस्कुराने लगे याद-ए-तयबा ने बेचैन मुझ को किया क़ाफ़िले जब मदीने को जाने लगे अपनी उम्मत पे कैसे हुए मेहरबाँ ज़ख़्म खाए मगर मुस्कुराने लगे जब कहीं कोई शेर-ए-रज़ा आ गया सारे नज्दी वहीं थरथराने लगे ना'त-ख़्वाँ: शमीम रज़ा फ़ैज़ी सद्दाम वाहिदी jab kabhi naa't ham gungunaane lage bas hame.n mustafa yaad aane lage jab nabi ke nawaase chale karbala chaand sooraj bhi aansu bahaane lage paanw rakkhe hai.n sarkaar ne jis jagah meri miTTi wahi.n par Thikaane lage mere aaqa zaroor un ke ghar aaenge jo duroodon.n se ghar ko sajaane lage raat kaali thi lekin chamakne lagi mere sarkaar jab muskuraane lage yaad-e-tayba ne bechain mujh ko kiya qaafile jab madine ko jaane lage apni um...

ज़िंदगी यूँ तो सब जी रहे हैं मगर इस तरह का हो जीना तो क्या बात है / Zindagi Yun To Sab Jee Rahe Hain Magar Is Tarah Ka Ho Jeena To Kya Baat Hai

ज़िंदगी यूँ तो सब जी रहे हैं मगर इस तरह का हो जीना तो क्या बात है दाएँ बग़दाद हो, बाएँ अजमेर हो सामने हो मदीना तो क्या बात है मुश्क-ओ-'अंबर की भी मुझ को हाजत नहीं 'इत्र की भी मुझे अब ज़रुरत नहीं बा'द मरने के रुख़ पर मलो, दोस्तो ! मुस्तफ़ा का पसीना तो क्या बात है हम चले काश ! घर से जो तयबा नगर हो शुरू' आ'ला हज़रत के दर से सफ़र मेरी माँ की दु'आ हो शरीक-ए-सफ़र आए हज का महीना तो क्या बात है या ख़ुदा ! बस यही इल्तिजा है मेरी कू-ए-सरकार में हाज़िरी हो मेरी फ़ज्र का वक़्त हो और जुम्मे का हो दिन और हो हज का महीना तो क्या बात है है तमन्ना मेरी, आरज़ू है यही काश ! मैं देख लेता जो रू-ए-नबी रश्क करता मुक़द्दर मेरी मौत पर होता शहर-ए-मदीना तो क्या बात है एक ताजुश्शरी'आ हैं रहबर मेरे जिन का साया हमेशा है सर पर मेरे सामने आप के मैं भी हाज़िर रहूँ बा-अदब बा-क़रीना तो क्या बात है इस तरह आ'ला हज़रत का परचम उठे इस तरह आ'ला हज़रत का ना'रा लगे जिस की हैबत से हर दुश्मन-ए-दीन का छूट जाए पसीना तो क्या बात है दीप रौशन हो हर दिल में ईमान का काश ! हर कोई हाफ़िज़ ह...

मुस्तफ़ा आप के जैसा कोई आया ही नहीं / Mustafa Aap Ke Jaisa Koi Aaya Hi Nahin

मुस्तफ़ा आप के जैसा कोई आया ही नहीं आता भी कैसे, जब अल्लाह ने बनाया ही नहीं कोई सानी न है रब का, न मेरे आक़ा का एक का जिस्म नहीं, एक का साया ही नहीं क़ब्र में जब कहा सरकार ने, ये मेरा है फिर फ़रिश्तों ने मुझे हाथ लगाया ही नहीं ज़ुल्फ़ वल्लैल है, रुख़ वद्दुहा, मा-ज़ाग़ आँखें इस तरह रब ने किसी को भी सजाया ही नहीं आप ने जब से नवाज़ा है, या रसूलल्लाह ! मैं ने दामन किसी चौखट पे बिछाया ही नहीं जिस ने सरकार के चेहरे की ज़ियारत की है उस की नज़रों में कोई और समाया ही नहीं लौट कर आ गया मक्के से, मदीने न गया कैसे जाता, तुझे आक़ा ने बुलाया ही नहीं जब से दरवाज़े पे लिखा मैं ने आ'ला हज़रत कोई गुस्ताख़-ए-नबी घर मेरे आया ही नहीं जब से दरवाज़े पे लिखा है या रसूलल्लाह कोई गुस्ताख़-ए-नबी घर मेरे आया ही नहीं जब तलक पुश्त पे शब्बीर रहे, ऐ फ़ैज़ी ! सर को सज्दे से पयम्बर ने उठाया ही नहीं शायर: शमीम फ़ैज़ी ना'त-ख़्वाँ: शमीम फ़ैज़ी हाफ़िज़ ताहिर क़ादरी ग़ुलाम मुस्तफ़ा क़ादरी mustafa aap ke jaisa koi aaya hi nahi.n aata bhi kaise, jab allah ne banaaya hi nahi.n koi saani na hai rab ka, ...

जहाँ पे मेरे पयंबर का तज़्किरा होगा | हुसैन तेरे ही क़ब्ज़े में कर्बला होगा / Jahaan Pe Mere Payambar Ka Tazkira Hoga | Husain Tere Hi Qabze Mein Karbala Hoga

जहाँ पे मेरे पयंबर का तज़्किरा होगा ख़ुदा के फ़ज़्ल का पहरा वहाँ लगा होगा यज़ीदी पहरा लगाएँ तो उस से क्या होगा हुसैन ! तेरे ही क़ब्ज़े में कर्बला होगा क़सम ख़ुदा की ! वो मंज़र बदल गया होता यज़ीदियों का कलेजा दहल गया होता हुसैन हाथ दु'आ को अगर उठा देते तो कर्बला में भी ज़मज़म निकल गया होता नज़र से ख़ून, नज़ारों से ख़ून टपकेगा इशारा होता, इशारों से ख़ून टपकेगा अगर हुसैन के सज्दे को भूल जाओगे तो मस्जिदों के मीनारों से ख़ून टपकेगा लहू में रंग है बाक़ी तो कर्बला चलिए अगर है ख़ून में गर्मी तो कर्बला चलिए नबी के नाम का सदक़ा लुटा रहे हैं हुसैन किसी को चाहिए पानी तो कर्बला चलिए वहाँ की मौत भली है, यहाँ के जीने से जहाँ निकलता है ज़मज़म ज़मीं के सीने से मैं उस हुसैन को क़ुरआँ नहीं तो क्या समझूँ रसूल-ए-पाक लगाते हैं जिन को सीने से ना'त-ख़्वाँ: शमीम फ़ैज़ी सैफ़ रज़ा कानपुरी jahaa.n pe mere payambar ka tazkira hoga KHuda ke fazl ka pehra wahaa.n laga hoga yazeedi pehra lagaae.n to us se kya hoga husain ! tere hi qabze me.n karbala hoga qasam KHuda ki ! wo manzar badal gaya hota yaz...

दिल का अरमान है आरज़ू है यही, मेरा सोया मुक़द्दर जगा दीजिए / Dil Ka Armaan Hai Aarzoo Hai Yahi, Mera Soya Muqaddar Jaga Dijiye

दिल का अरमान है, आरज़ू है यही मेरा सोया मुक़द्दर जगा दीजिए मर न जाऊँ कहीं, ख़ातमुल-मुर्सलीं ! सब्ज़-गुंबद हमें फिर दिखा दीजिए दिल का अरमान है, आरज़ू है यही मेरा सोया मुक़द्दर जगा दीजिए प्यार से बोले एक दिन ये ज़हरा के लाल सुनिए इक बात मेरी, ए प्यारे बिलाल ! जो सुनाते रहे नाना-जाँ को मेरे वो अज़ाँ आज फिर से सुना दीजिए दिल का अरमान है, आरज़ू है यही मेरा सोया मुक़द्दर जगा दीजिए जो भी मुर्दा कहे मेरे सरकार को छोड़िए न कभी ऐसे ग़द्दार को चढ़ के सीने पे उस के, मेरे दोस्तो ! दोनों हाथों से गर्दन दबा दीजिए दिल का अरमान है, आरज़ू है यही मेरा सोया मुक़द्दर जगा दीजिए सुन्नियत का चमन लहलहाने लगे नजदियत का क़िला' थरथराने लगे मस्लक-ए-आ'ला-हज़रत का सुनिए, शमीम ! एक पुर-ज़ोर ना'रा लगा दीजिए दिल का अरमान है, आरज़ू है यही मेरा सोया मुक़द्दर जगा दीजिए शायर: शमीम फ़ैज़ी ना'त-ख़्वाँ: शमीम फ़ैज़ी dil ka armaan hai, aarzoo hai yahi mera soya muqaddar jaga dijiye mar na jaau.n kahi.n, KHaatmul-mursalee.n ! sabz-gumbad hame.n phir dikha dijiye dil ka armaan hai, aarzoo hai ya...

हुसैन आज सर को कटाने चले हैं / Husain Aaj Sar Ko Katane Chale Hain

मुहम्मद पे सब कुछ लुटाने चले हैं हुसैन आज सर को कटाने चले हैं जो बचपन में नाना से वा'दा किया था उसे करबला में निभाने चले हैं मुहम्मद पे सब कुछ लुटाने चले हैं हुसैन आज सर को कटाने चले हैं मिलेगा न तारीख़ में ऐसा गाज़ी लगा दे जो औलाद की जां की बाज़ी दिखाए कोई उनके जैसा नमाज़ी जो सजदे में गरदन कटाने चले हैं मुहम्मद पे सब कुछ लुटाने चले हैं हुसैन आज सर को कटाने चले हैं बड़े नाज़ से जिन को पाला नबी ने जिन्हें रखा पलकों पे मौला अली ने जिन्हें फ़ातिमा बी ने झूला झुलाया वो हीं तीर सीने पे खाने चले हैं मुहम्मद पे सब कुछ लुटाने चले हैं हुसैन आज सर को कटाने चले हैं यही केह के अकबर की तलवार चमकी इधर आ सितमगर, क्या देता है धमकी जो अकबर निशानी है शाहे-उमम की अली का वो तेवर दिखाने चले हैं मुहम्मद पे सब कुछ लुटाने चले हैं हुसैन आज सर को कटाने चले हैं जो बचपन में नाना से वा'दा किया था उसे करबला में निभाने चले हैं नातख्वां: शमीम रज़ा फ़ैज़ी

ज़माने की निग़ाहों में वो रुस्वा हो नहीं सकता / Zamane Ki Nigahon Mein Wo Ruswa Ho Nahin Sakta

ज़माने की निग़ाहों में वो रुस्वा हो नहीं सकता नबी कर दें जिसे ऊँचा वो नीचा हो नहीं सकता कभी उस शख्स के ऐबों का चर्चा हो नहीं सकता भरम जिस का नबी रखें वो रुस्वा हो नहीं सकता रसूले-पाक को हमने ख़ुदा का नूर माना है हमारी क़ब्र में हरगिज़ अँधेरा हो नहीं सकता बिठाते थे मेरे सरकार जिन को अपने कांधों पर हुसैन इब्ने अली जैसा नवासा हो नहीं सकता हर एक ज़र्रा ज़मीने-कर्बला का झूम कर बोला कोई बच्चा अली असग़र के जैसा हो नहीं सकता ज़मीने-हिन्द पर अब भी मेरे ख़्वाजा का क़ब्ज़ा है यहाँ इनके अलावा कोई राजा हो नहीं सकता किसी की भी हुकूमत हो, कोई भी राज करता हो मगर ख़्वाजा पिया सा कोई राजा हो नहीं सकता नातख्वां: मुहम्मद शरीफ़ रज़ा